18 August 2025 Current Affairs Questions
हैलो दोस्तों !
आज हम current affairs के इन बिंदुओं पर गहराई से विचार करेंगे और उम्मीद करेंगे कि आप इन बिंदुओं को लंबे समय तक याद रखने के लिए हमारे साथ 30 से अधिक प्रश्नों की क्विज जरूर खेलेंगे. दी गई घटनाओं पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न नीचे दिए गए हैं।
- A1. समुद्र से कार्बन सोखने का कमाल: प्रोजेक्ट Sea CUR
- A2. एआई डीपफेक के खिलाफ 'टेक इट डाउन एक्ट': क्या है यह कानून और क्यों है महत्वपूर्ण?
- A3. 'क्लोरपाइरीफोस' कीटनाशक पर भारत का रुख: क्या है 'BRS' कॉप्स 2025 का पूरा मामला?
- A4. विश्व हाइड्रोजन शिखर सम्मेलन 2025: भारत की ऊर्जा क्रांति
- A5. आकाशगंगाओं का बुल्सआई: एक खगोलीय अजूबा
- A6. नवाचार का महाकुंभ: सुफलम 2025 सम्मेलन
आप प्रतिदिन हमारी वेबसाइट SelfStudy Meter पर 30 करंट अफेयर प्रश्नों को पढ़ सकते हैं और अगले दिन सुबह 7:00 बजे इन पढ़े हुए प्रश्नों की क्विज खेल सकते हैं हमारे YouTube channel - Mission: CAGS पर, जबकि प्रतिदिन 45 से अधिक करंट अफेयर प्रश्नों की क्विज खेलने के लिए व pdf डाउनलोड करने के लिए हमें टेलीग्राम पर फॉलो कर सकते हैं ।
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Quiz time on Telegram is 7:30 p.m
क्विज खेलने के फायदे:
क्विज खेलने से आपकी रीडिंग स्किल इंप्रूव होगी, लर्निंग स्किल बढ़ेगी और आप अपनी तैयारी का स्वमूल्यांकन कर सकेंगे मतलब आप अपना याद किया हुआ चेक कर सकेंगे कि आपके द्वारा पढ़ा हुआ आपको कितना याद है?क्विज खेलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप अपनी तैयारी को एक दिशा दे पाएंगे।
A1.
समुद्र से कार्बन सोखने का कमाल:
प्रोजेक्ट
Sea CUR
SeaCURE:
A New Hope from the Ocea
क्या आप जानते हैं कि हमारे महासागर जलवायु परिवर्तन से लड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं? इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर शुरू हुआ एक छोटा सा पायलट प्रोजेक्ट, 'प्रोजेक्ट Sea CURE', इसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह परियोजना सीधे समुद्री जल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को अवशोषित करने का एक अनूठा तरीका खोज रही है, जिसका उद्देश्य हमारे वायुमंडल में CO₂ के बढ़ते स्तर को कम करना है।
'प्रोजेक्ट Sea
CURE' क्या है?
यह एक लघु-स्तरीय पायलट परियोजना है जो यह जांच कर रही है कि क्या समुद्री जल से सीधे कार्बन को हटाकर वायुमंडलीय CO₂ को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। यह पारंपरिक कार्बन कैप्चर विधियों से अलग है।
पारंपरिक कार्बन कैप्चर से यह कैसे भिन्न है?
पारंपरिक तरीकों में, कार्बन को या तो उत्सर्जन के स्रोत (जैसे पावर प्लांट) पर कैप्चर किया जाता है, या फिर सीधे हवा से पृथक किया जाता है। 'प्रोजेक्ट Sea CURE' का तरीका इन दोनों से अलग है, क्योंकि यह समुद्र के विशालकाय भंडार का उपयोग करता है, जो पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक कार्बन सिंक है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
लक्ष्य: इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य यह पता लगाना है कि क्या समुद्री जल से कार्बन को सफलतापूर्वक और लागत प्रभावी ढंग से हटाया जा सकता है।
सरकार का समर्थन: ब्रिटेन की सरकार ने 2023 में कार्बन कैप्चर और भंडारण (CCS) प्रौद्योगिकियों का समर्थन करने के लिए £20 बिलियन ($26.7 बिलियन) तक के वित्तपोषण की घोषणा की। 'प्रोजेक्ट Sea CURE' जैसी परियोजनाएं इसी पहल का हिस्सा हैं।
भविष्य की संभावनाएँ: यदि यह पायलट परियोजना सफल होती है, तो यह वैश्विक स्तर पर कार्बन हटाने के प्रयासों में एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। समुद्र की विशालता को देखते हुए, यह तकनीक बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद कर सकती है।
अतिरिक्त जानकारी:
समुद्र और कार्बन: हमारे महासागरों ने औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव-जनित CO₂ के लगभग 30-40% हिस्से को अवशोषित कर लिया है। हालाँकि, यह प्रक्रिया महासागरीय अम्लीकरण (Ocean acidification) का कारण बन रही है, जो समुद्री जीवन के लिए हानिकारक है। 'प्रोजेक्ट Sea CURE' जैसी तकनीक इस प्रक्रिया को उल्टा करने में भी मदद कर सकती है।
डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC): यह भी एक नई तकनीक है जो सीधे वायुमंडल से CO₂ को हटाती है। 'Sea CURE' एक तरह का 'समुद्री DAC' माना जा सकता है।
कार्बन सिंक (Carbon Sink): प्रकृति में जंगल और महासागर जैसे प्राकृतिक भंडार हैं जो वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। Sea CURE जैसे प्रोजेक्ट इन प्राकृतिक सिंक को और भी प्रभावी बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
A2.
एआई डीपफेक के खिलाफ 'टेक इट डाउन एक्ट': क्या है यह कानून और क्यों है महत्वपूर्ण?
'Take
It Down Act' Against AI Deepfakes: What is This Law and Why is it Important?
आज के डिजिटल युग में, जहाँ तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है, वहीं इसके कुछ गंभीर खतरे भी सामने आ रहे हैं। इनमें से सबसे बड़ा खतरा है बिना सहमति के बनाई गई डीपफेक सामग्री, जिसमें एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का उपयोग करके किसी व्यक्ति की स्पष्ट और आपत्तिजनक छवियां या वीडियो बनाए जाते हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ऐतिहासिक कानून पर हस्ताक्षर किए, जिसे 'टेक इट डाउन एक्ट' के नाम से जाना जाता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य एआई-जनरेटेड डीपफेक सहित बिना सहमति के साझा की गई आपत्तिजनक सामग्री को रोकना है।
आइए, इस महत्वपूर्ण कानून के बारे में कुछ मुख्य बातें जानते हैं:
यह क्या है? 'टेक इट डाउन एक्ट' एक संघीय कानून है, जो बिना सहमति के किसी व्यक्ति की स्पष्ट छवियों या वीडियो को ऑनलाइन साझा करना एक अपराध बनाता है। यह कानून विशेष रूप से एआई-जनरेटेड सामग्री को लक्षित करता है, जो आजकल एक बड़ी समस्या बन गई है।
मेलानिया ट्रम्प का समर्थन: इस कानून को पूर्व फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रम्प का मजबूत समर्थन मिला। उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस बिल की वकालत की, जिससे इसे दोनों दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। यह दर्शाता है कि यह मुद्दा राजनीतिक सीमाओं से परे है और पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी: इस कानून के तहत, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को पीड़ितों द्वारा अनुरोध किए जाने पर 48 घंटों के भीतर ऐसी सामग्री को हटाना अनिवार्य है। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। यह प्रावधान पीड़ितों को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए बनाया गया है।
अपराधियों के लिए सजा: इस कानून का उल्लंघन करने वाले अपराधियों को जेल की सजा का सामना करना पड़ सकता है। यह प्रावधान उन लोगों के लिए एक मजबूत निवारक के रूप में कार्य करता है जो इस तरह के आपत्तिजनक कंटेंट को बनाते या साझा करते हैं।
बदला लेने वाले पोर्न (Revenge Porn) से सुरक्षा: यह कानून मुख्य रूप से "बदला लेने वाले पोर्न" के पीड़ितों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य ऑनलाइन गैर-सहमति वाली यौन छवियों के प्रसार को रोकना है।
यह कानून क्यों महत्वपूर्ण है?
आज, जब एआई तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि वह किसी भी व्यक्ति के चेहरे या शरीर का उपयोग करके यथार्थवादी और झूठे वीडियो या छवियां बना सकती है, तब 'टेक इट डाउन एक्ट' जैसे कानून की सख्त आवश्यकता थी। यह न केवल व्यक्तियों की गरिमा और निजता की रक्षा करता है, बल्कि इंटरनेट को एक सुरक्षित स्थान बनाने में भी मदद करता है। यह कानून दर्शाता है कि सरकारें भी इस डिजिटल खतरे को गंभीरता से ले रही हैं और इससे लड़ने के लिए ठोस कदम उठा रही हैं।
अतिरिक्त जानकारी:
डीपफेक क्या हैं? डीपफेक एक प्रकार की एआई-जनित सामग्री है, जिसमें मौजूदा वीडियो या छवियों में किसी व्यक्ति का चेहरा या आवाज बदल दी जाती है। यह तकनीक बहुत ही यथार्थवादी होती है, जिससे असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो जाता है।
विश्वव्यापी चुनौती: यह समस्या केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। दुनिया भर की सरकारें और संगठन एआई-जनित डीपफेक सामग्री के प्रसार को रोकने के तरीकों पर विचार कर रहे हैं। 'टेक इट डाउन एक्ट' एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकता है जिसे अन्य देश भी अपना सकते हैं।
A3.
'क्लोरपाइरीफोस' कीटनाशक पर भारत का रुख: क्या है 'BRS' कॉप्स 2025 का पूरा मामला?
India's
Stand on 'Chlorpyrifos' Pesticide: The Full Story of 'BRS' COPs 2025
हाल ही में, 28 अप्रैल से 9 मई 2025 तक, स्विट्जरलैंड के जिनेवा में एक महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन का आयोजन हुआ - बेसल, रॉटरडैम और स्टॉकहोम (BRS) सम्मेलनों के पार्टियों का सम्मेलन (COP)। यह सम्मेलन 'रसायनों और अपशिष्टों के उचित प्रबंधन' जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा करने के लिए दुनिया भर के देशों को एक मंच पर लाता है। इस वर्ष के सम्मेलन का विषय था, "अदृश्य को दृश्यमान बनाएँ: रसायनों और अपशिष्टों का उचित प्रबंधन।"
भारत ने भी इस सम्मेलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में एक अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, इस सम्मेलन में एक मुद्दा ऐसा था जिस पर भारत का रुख बाकी देशों से अलग था - कीटनाशक 'क्लोरपाइरीफोस' पर वैश्विक प्रतिबंध का मामला।
क्लोरपाइरीफोस: क्यों है यह चर्चा का विषय?
क्या है क्लोरपाइरीफोस? यह एक व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला कीटनाशक है, जिसका उपयोग कृषि में फसलों को कीटों से बचाने के लिए किया जाता है।
वैश्विक चिंता: BRS कन्वेंशन, 2025 में कई देशों ने स्टॉकहोम कन्वेंशन के तहत इस पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की। लगभग 40 से अधिक देशों ने पहले ही इस पर प्रतिबंध लगा दिया है।
भारत का विरोध क्यों? भारत ने इस प्रतिबंध का विरोध किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में यह कीटनाशक अभी भी कई फसलों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत सरकार का मानना है कि इसके सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नियम और कानून मौजूद हैं, और पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे 'मध्यम रूप से खतरनाक' कीटनाशक के रूप में वर्गीकृत किया है। यह रसायन 'एसिटाइलकोलिनेस्टरेज़' नामक एक महत्वपूर्ण एंजाइम को रोकता है, जिससे तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसका इस्तेमाल कई देशों में न्यूरोलॉजिकल विकारों से जुड़ा हुआ है, खासकर बच्चों में।
BRS कन्वेंशन क्या हैं?
यह तीन अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े हुए अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का समूह है, जो खतरनाक रसायनों और अपशिष्टों के प्रबंधन से संबंधित हैं:
बेसल कन्वेंशन: खतरनाक अपशिष्टों की सीमा-पार आवाजाही को नियंत्रित करता है।
रॉटरडैम कन्वेंशन: कुछ खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के आयात के लिए 'पूर्व सूचित सहमति' (PIC) प्रक्रिया प्रदान करता है।
स्टॉकहोम कन्वेंशन: स्थायी जैविक प्रदूषकों (POPs) को प्रतिबंधित करता है। 'क्लोरपाइरीफोस' जैसे रसायन को इसी कन्वेंशन के तहत प्रतिबंधित करने की मांग की गई थी।
A4.
विश्व हाइड्रोजन शिखर सम्मेलन 2025: भारत की ऊर्जा क्रांति
World
Hydrogen Summit 2025: India's Energy Revolution
रॉटरडैम, नीदरलैंड्स - 20 मई, 2025 को नीदरलैंड के रॉटरडैम में आयोजित विश्व हाइड्रोजन शिखर सम्मेलन (World Hydrogen Summit)
2025 में भारत की भागीदारी ने दुनिया का ध्यान खींचा। इस तीन दिवसीय शिखर सम्मेलन (20-22 मई, 2025) में भारत का प्रतिनिधित्व केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव श्री संतोष कुमार सारंगी ने किया, जिन्होंने भारत के महत्वाकांक्षी हरित ऊर्जा लक्ष्यों और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन नीति पर प्रकाश डाला।
यह सम्मेलन सतत ऊर्जा परिषद और आरएक्स ग्लोबल द्वारा नीदरलैंड सरकार और अन्य स्थानीय साझेदारों, जैसे जुइद-हॉलैंड प्रांत, रॉटरडैम शहर और रॉटरडैम के बंदरगाह के सहयोग से आयोजित किया गया। इस मंच पर, भारत ने अपनी ऊर्जा स्वतंत्रता और पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।
भारत के हरित ऊर्जा लक्ष्य और उपलब्धियाँ
भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए साहसिक कदम उठाए हैं और इसके परिणाम भी दिख रहे हैं। देश में अब तक 223 गीगावाट से अधिक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित हो चुकी है, जिसमें 108 गीगावाट सौर ऊर्जा और 51 गीगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से हटकर स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
भारत ने दो प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किए हैं:
वर्ष
2047 तक ऊर्जा स्वतंत्रता प्राप्त करना।
वर्ष
2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net-Zero Carbon Emission) के लक्ष्य को प्राप्त करना।
ये लक्ष्य न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि कैसे आर्थिक विकास को पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जा सकता है।
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: एक गेम-चेंजर
भारत सरकार ने देश में हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा देने के लिए एक दूरदर्शी राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen
Mission) शुरू किया है। इस मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन का वैश्विक केंद्र बनाना है। इसके तहत, सरकार हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र स्थापित करने वाली कंपनियों को विभिन्न प्रोत्साहन दे रही है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
इस मिशन के प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार हैं:
वर्ष
2030 तक हर साल 5 मिलियन मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का विकास करना।
इससे हर साल लगभग 50 एमएमटी (मिलियन मीट्रिक टन) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना।
इस क्षेत्र में लगभग 100 बिलियन अमरीकी डॉलर का निवेश आकर्षित करना।
रोजगार के नए अवसर पैदा करना और भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना।
हरित हाइड्रोजन क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) वह हाइड्रोजन है जिसका उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों, जैसे सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग करके जल के इलेक्ट्रोलिसिस से किया जाता है। इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया में पानी (H₂O) को हाइड्रोजन (H₂) और ऑक्सीजन (O₂) में विभाजित किया जाता है। इस प्रक्रिया में कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता, जिससे यह जीवाश्म ईंधन का एक आदर्श विकल्प बन जाता है।
हरित हाइड्रोजन का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है, जैसे:
परिवहन: वाहनों को चलाने के लिए।
उद्योग: इस्पात और उर्वरक जैसे उद्योगों में ईंधन के रूप में।
ऊर्जा भंडारण: नवीकरणीय ऊर्जा के अत्यधिक उत्पादन को संग्रहीत करने के लिए।
A5.
आकाशगंगाओं का बुल्सआई: एक खगोलीय अजूबा
The
Bull's Eye Galaxy: A Cosmic Wonder
क्या आपने कभी ब्रह्मांड में एक ऐसे "बुल्सआई" की कल्पना की है? वैज्ञानिकों को एक ऐसी ही असाधारण आकाशगंगा मिली है, जिसे बुल्सआई गैलेक्सी के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम LEDA 1313424 है, और यह अपनी अनूठी रिंग संरचना के कारण खगोलविदों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
मुख्य बिंदु:
खोज का श्रेय: इस रहस्यमयी आकाशगंगा की खोज का श्रेय नासा के प्रतिष्ठित हबल स्पेस टेलीस्कोप को जाता है, जिसने शुरुआती तौर पर इसमें आठ अलग-अलग वलयों (रिंग्स) का पता लगाया था।
नौवीं रिंग का रहस्य: हवाई में स्थित डब्ल्यू. एम. केक वेधशाला (W. M. Keck Observatory) ने बाद में इस खोज की पुष्टि की और एक और, नौवें, बाहरी वलय को खोजकर इस खगोलीय आश्चर्य की ज्ञात सीमाओं को और भी बढ़ा दिया।
स्थान और दूरी: यह अद्भुत आकाशगंगा मीन राशि (Pisces) के तारामंडल में स्थित है और हमसे लगभग 567 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है। "प्रकाश वर्ष" वह दूरी है जो प्रकाश एक साल में तय करता है, और यह दूरी बताती है कि यह आकाशगंगा हमसे कितनी विशाल दूरी पर है।
आकार का विशालकाय रूप: बुल्सआई गैलेक्सी कोई साधारण आकाशगंगा नहीं है। यह एक विशाल अण्डाकार आकाशगंगा है, जिसका व्यास लगभग 250,000 प्रकाश वर्ष है। तुलना के लिए, हमारी अपनी आकाशगंगा, मिल्की वे, से यह लगभग 2.5 गुना बड़ी है।
यह क्यों खास है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि बुल्सआई गैलेक्सी की यह अनोखी रिंग संरचना किसी अन्य आकाशगंगा के साथ इसके टकराव का परिणाम हो सकती है। जब दो आकाशगंगाएँ आपस में टकराती हैं, तो उनके गुरुत्वाकर्षण बल के कारण धूल और गैस की विशाल लहरें बनती हैं, जो धीरे-धीरे वलयों का रूप ले लेती हैं। बुल्सआई गैलेक्सी में इतनी सारी रिंग्स का होना एक दुर्लभ घटना है, जो इसे खगोलविदों के लिए अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय बनाती है। यह हमें आकाशगंगाओं के विकास और उनके बीच होने वाली जटिल अंतःक्रियाओं को समझने में मदद करती है।
A6.
नवाचार का महाकुंभ: सुफलम 2025 सम्मेलन
The
Great Confluence of Innovation: SUFALAM 2025 Conference
क्या आप जानते हैं कि भारत का खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र (Food Processing Sector) तेज़ी से बढ़ रहा है, और इस विकास को गति देने में "सुफलम" (SUFALAM) जैसे आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं? हाल ही में, 25 और 26 अप्रैल, 2025 को हरियाणा के कुंडली, सोनीपत में स्थित राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान (NIFTEM) ने "सुफलम 2025" के दूसरे संस्करण की मेजबानी की। यह सम्मेलन सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि भारत के खाद्य उद्यमियों और नवाचारियों के लिए एक बड़ा मंच था!
सुफलम क्या है?
सुफलम का पूरा नाम स्टार्ट-अप फोरम फॉर एस्पायरिंग लीडर्स एंड मेंटर्स है। इसका मुख्य उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में नए विचारों, स्टार्टअप्स और अनुभवी मार्गदर्शकों (Mentors) को एक साथ लाना है। इस सम्मेलन का लक्ष्य नवाचार, उद्यमिता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देकर भारत के खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को और अधिक मजबूत बनाना है।
मुख्य बिंदु:
आयोजन स्थल: सुफलम 2025 का आयोजन राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान (NIFTEM), कुंडली, सोनीपत, हरियाणा में हुआ। NIFTEM भारत में खाद्य प्रौद्योगिकी शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में एक प्रमुख संस्थान है।
उद्देश्य: इस मंच का उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में स्टार्टअप्स और उद्यमियों को बढ़ावा देना, नए विचारों को मंच प्रदान करना और उद्योग के दिग्गजों के साथ उनके संबंधों को मजबूत करना है।
सम्मेलन का फोकस: सम्मेलन में खाद्य उत्पादन, पैकेजिंग, खाद्य सुरक्षा, और टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।
पहला संस्करण: सुफलम का पहला संस्करण 13-14 फरवरी, 2024 को नई दिल्ली में आयोजित किया गया था, जो कि एक बड़ी सफलता थी।
अतिरिक्त जानकारी: खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह किसानों की आय बढ़ाने, खाद्य पदार्थों की बर्बादी को कम करने और रोज़गार के अवसर पैदा करने में मदद करता है। सुफलम जैसे आयोजन इस क्षेत्र को और अधिक संगठित और प्रतिस्पर्धी बनाने में सहायक हैं।
उपरोक्त घटनाओं पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न के लिए यहां क्लिक करें ।
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